प्रचंड गर्मी में बिजली व्यवस्था ध्वस्त

जनता का गुस्सा कई बिजली उपकेन्द्र पर फूटा

शीर्ष प्रबंधन को गुमराह कर रहे फील्ड के अधिकारी

कौन रोकेगा बिजली चोरी?

दिन में 60-70 एंपियर लोड रात में लोड ढाई सौ एंपियर _ ?

लखनऊ। भीषण गर्मी के बीच बिजली व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। राजधानी लखनऊ सहित आसपास के कई जिलों में घंटों की कटौती, फुंकते ट्रांसफार्मर, जलती एबीसी केबल और अंधेरे में डूबे मोहल्लों ने जनता का गुस्सा चरम पर पहुंचा दिया है। हालात इतने भयावह हैं कि लोग रातभर जागने को मजबूर हैं, व्यापारी बर्बादी के कगार पर हैं और पुलिस तक बिजली उपकेंद्रों की सुरक्षा में झोंकी जा रही है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब जनता चीख रही है तो ऊर्जा विभाग के अधिकारी आखिर शीर्ष प्रबंधन को सच क्यों नहीं बता रहे? झूठ क्यों बोला जा रहा है?

विशेष सचिव ऊर्जा एवं यूपी पावर कॉरपोरेशन के अध्यक्ष आशीष गोयल ने 20 मई को आपातकालीन बैठक कर राजधानी के अधिकारियों से पूछा “क्या संसाधनों की कमी है? क्या कर्मचारियों की कमी है?”

बताया जाता है कि अधिकारियों ने एक सुर में जवाब दिया “सब कुछ पर्याप्त है, ऑल इज़ वेल।”

यदि सब कुछ ठीक है तो फिर राजधानी अंधेरे में क्यों डूबी है?

यदि संसाधन पर्याप्त हैं तो ट्रांसफार्मर रोज क्यों फुंक रहे हैं?

यदि व्यवस्था मजबूत है तो जनता सड़कों पर क्यों उतर रही है?

 

हालात तो इस क़दर ख़राब बताए जारहे हैं कि जनता ने बिजली की ख़राब व्यवस्था को लेकर एक पवार हाउस पर पथराव तक कर दिया।

स्थिति यह है कि सांसद और विधायक अपनी ही सरकार के अधिकारियों के खिलाफ पत्र लिख रहे हैं। विपक्षी विधायक धरने पर बैठ रहे हैं। सोशल मीडिया पर वीडियो जारी हो रहे हैं। पार्षद और स्थानीय जनप्रतिनिधि नागरिकों के साथ उपकेंद्रों पर प्रदर्शन कर रहे हैं, अधिकारियों का घेराव कर रहे हैं, लेकिन बाद में सरकार की बदनामी रोकने के लिए इसे केवल “वार्ता” बताया जाता है।

सच यह है कि विभाग में नीचे से ऊपर तक भय और दिखावे की संस्कृति हावी हो चुकी है। अधिकारी जनता का दर्द बताने के बजाय अपनी कुर्सी बचाने में लगे हैं। जमीनी हकीकत छिपाकर केवल चमकदार रिपोर्टें भेजी जा रही हैं।

दो वर्षों से आरडीएसएस और बिजनेस प्लान के नाम पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन नतीजे जमीन पर दिखाई नहीं दे रहे। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद न उपकेंद्र मजबूत हुए और न ही उपभोक्ताओं को राहत मिली।

पहले जहां डिवीजनों का अलग-अलग संचालन होता था, अब पूरा बोझ सीमित अधिकारियों और कर्मचारियों पर डाल दिया गया है। एक-एक जेई और एसडीओ के पास कई-कई उपकेंद्रों का चार्ज है। नतीजा — फील्ड में अफरा-तफरी और उपभोक्ताओं में भारी आक्रोश।

ऊर्जा विभाग की तथाकथित “वर्टिकल व्यवस्था” अब जनता के लिए अभिशाप बन चुकी है। विभाग इसे सुधार बताता रहा, लेकिन जमीनी स्तर पर इस व्यवस्था ने बिजली तंत्र को खोखला कर दिया। जिन शहरों में पहले यह प्रयोग हुआ, वहां भी जनता त्राहिमाम करती रही, लेकिन अफसरों ने हर आलोचना को “अनर्गल प्रचार” कहकर दबाने का प्रयास किया।

बिजली चोरी रोकने के नाम पर भी बड़ा खेल चल रहा है। विभागीय सूत्रों के मुताबिक कुछ कर्मचारी खुद चोरी को संरक्षण देने में लगे हैं। उपभोक्ताओं को बताया जाता है कि अब चोरी पकड़ने का अधिकार सीमित अधिकारियों के पास है, जिसका फायदा बिजली माफिया खुलेआम उठा रहे हैं।

सूत्र बताते हैं कि पुराने लखनऊ के कई इलाकों में मिलीभगत से धड़ल्ले से बिजली चोरी हो रही है। दिन में जहां 60-70 एंपियर लोड रहता है, वहीं रात होते-होते वही लोड ढाई सौ एंपियर तक पहुंच जाता है। नतीजा एबीसी केबल जल रही हैं और पूरी व्यवस्था ध्वस्त हो रही है।

कटौती से व्यापारी तबाह हैं। करोड़ों का कारोबार प्रभावित हो रहा है। आम आदमी गर्मी में तड़प रहा है। बच्चे और बुजुर्ग रातभर बिजली का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन विभाग के अधिकारी एसी कमरों में बैठकर “सब कंट्रोल में है” का राग अलाप रहे हैं।

यह कटु सत्य है कि बिना संसाधन, बिना पर्याप्त कर्मचारियों और चरमराई व्यवस्था के बीच कोई भी अधिकारी चमत्कार नहीं कर सकता। परंतु नकारा अधिकारियों का बोझ जनता आखिर कब तक सहेगी?

क्या जनता को केवल विज्ञप्तियों और दावों से बिजली मिलेगी?

क्या जमीनी सच छिपाकर व्यवस्था सुधर जाएगी?

क्या हजारों करोड़ खर्च होने के बाद भी जनता अंधेरे में ही रहेगी?

यदि सरकार वास्तव में प्रदेश में कानून व्यवस्था और जनता को राहत देना चाहती है तो तत्काल वर्टिकल व्यवस्था समाप्त कर पुरानी प्रणाली बहाल करनी होगी। उपकेंद्रों पर पर्याप्त कर्मचारियों की तैनाती, बिजली चोरी पर कठोर कार्रवाई और आरडीएसएस व बिजनेस प्लान के अधूरे कार्यों को युद्धस्तर पर पूरा करना होगा।

अन्यथा आने वाले दिनों में यह बिजली संकट केवल तकनीकी समस्या नहीं रहेगा, बल्कि जनता के बड़े आक्रोश का रूप ले सकता है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि यदि उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का यह हाल है, तो प्रदेश के अन्य जिलों की स्थिति का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।

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