पहली मेहरम को रिवायती अंदाज से निकला गया शाही मोम की जरी का जुलूस

कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के साथ आसिफी इमाम बाड़े से छोटे इमाम बाड़े पहुंचा शाही जुलूस

जुलूस में हर मजहब व मिल्लत के लोग हुए शामिल गंगा जमुना तहज़ीब की मिसाल है यह जुलूस

 

लखनऊ। नवाबों के दौर की याद ताज़ा करते हुए शहर लखनऊ में आज पहली मोहर्रम के अवसर पर हुसैनाबाद ट्रस्ट द्वारा शाही ज़री का भव्य जुलूस अपनी पूरी शान-शौकत के साथ बड़े इमामबाड़े से निकाला गया। इस जुलूस का आग़ाज़ बड़े इमामबाड़े में एक मजलिस के आयोजन के साथ हुआ, मजलिस को मौलाना अली हैदर ने खिताब किया। जिसमें हजरत इमाम हुसैन (अ,स )और उनके 72 साथियों की शहादत को याद किया गया। हजारों अकीदतमंदों ने इस जुलूस में शिरकत की, जो रूमी गेट, नींबू पार्क,घंटाघर, सतखंडा, और रईस मंजिल होते हुए देर रात छोटे इमामबाड़े पहुंचकर समाप्त हुआ।

 

जुलूस में शाही जरी के पीछे एक और ताजिया था जो लाडो खानम का बताया जाता है उसके अलावा इस जुलूस में हाथी, घोड़े, और ऊंट पर शाही निशान लिए लोग शामिल थे। हजरत इमाम हुसैन की सवारी का प्रतीक दुलदुल (ज़ुलजनाह)और हजरत अब्बास (अ.स. )का अलम भी जुलूस में थे। इसके अलावा, मोम और अबरक से बनी शाही ज़री, जुलजनाह, और अन्य तबर्रुकात ने जुलूस को ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व प्रदान किया।साथ ही अंजुमनें और मातमी दस्ते सलाम और नौहों को पढ़ते हुए जुलूस में चल रहे थे।
इस दौरान श्रद्धालुओं की आंखें नम थीं, जिसमें शिया और सुन्नी समुदाय के लोग शामिल हुए।

सुरक्षा के कड़े इंतजाम

सूत्रों के मुताबिक जुलूस के लिए पुलिस प्रशासन ने व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की है। लगभग 500 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है, ड्रोन और हाई-रिजोल्यूशन सीसीटीवी कैमरों से जुलूस की निगरानी की जा रही है। सोशल मीडिया पर अफवाहों और आपत्तिजनक पोस्ट पर नजर रखने के लिए विशेष मॉनिटरिंग यूनिट बनाई गई है।

नवाबी परंपरा का प्रतीक

यह जुलूस नवाब मोहम्मद अली शाह के दौर से चली आ रही परंपरा का हिस्सा है, जिसमें नवाबी प्रतीकों जैसे शाही जरी, हाथी, घोड़े, और बैंड-बाजे शामिल हैं। इस बार की शाही जरी में बड़े इमामबाड़े की स्थापत्य छवि को दर्शाया गया है, जिसे कारीगर वसीम और उसके भाई नसीम ने मिलकर तैयार किया है। इस बार नसीम के नाम से टेंडर पास हुआ था,जबकि पहले वसीम के नाम से टेंडर पास होता आ रहा था। यह ज़री 17 फीट लंबी और 50 किलोग्राम वजनी है, जबकि मोम की जरी 22 फीट ऊंची और 10 क्विंटल वजनी है।

लखनऊ की यह गंगा-जमुनी तहजीब और नवाबी विरासत का प्रतीक जुलूस न केवल शिया समुदाय बल्कि विभिन्न धर्मों के लोगों को एकजुट करता है। जुलूस के मार्ग पर सबीलों का इंतजाम किया गया था, जहां अकीदतमंदों को शरबत और हिस्सा बांटा जा रहा था।

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