कौन रोकेगा बिजली चोरी?

दिन में 60-70 एंपियर, रात में 250 एंपियर लोड!

आखिर किसके संरक्षण में चल रहा खेल?

*लखनऊ*।*(*शेख साजिद हुसैन)* राजधानी के मध्य क्षेत्र की विद्युत व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। विभागीय दावों में सब कुछ “ऑल इज़ वेल” बताया जाता है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और कहानी बयां कर रही है। बिजली चोरी रोकने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, विशेष टीमें गठित हैं, विजिलेंस सक्रिय है, फिर भी लाइन लॉस कम होने के बजाय कई इलाकों में बढ़ता नजर आ रहा है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब विभाग के पास पर्याप्त संसाधन, पुलिस बल, विजिलेंस टीम और अधिकारी मौजूद हैं तो बिजली चोरी पर लगाम क्यों नहीं लग पा रही?

सूत्रों के अनुसार मध्य क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले करीब 40 से अधिक उपकेंद्रों की निगरानी का जिम्मा सीमित अधिकारियों पर है। एक अधिशासी अभियंता, दो एसडीओ और चार अवर अभियंता पूरे क्षेत्र का संचालन कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त पुलिस की विशेष टीमें, विजिलेंस जेई और टीजी-2 कर्मी भी तैनात हैं। इसके बावजूद बिजली चोरी के मामलों में आश्चर्यजनक गिरावट दिखाई जा रही है।

जानकारों का कहना है कि वर्टिकल व्यवस्था लागू होने से पहले बिजली चोरी के मामलों की संख्या हर महीने 300 से अधिक तक पहुंच जाती थी। कार्रवाई होती थी, मुकदमे दर्ज होते थे और विभाग अपनी उपलब्धियां गिनाता था। लेकिन अब जब एक साथ कई विभागीय इकाइयां और विजिलेंस टीमें मैदान में हैं, तब महीने में पिछले आंकड़ों से कम ही मामले ही सामने आते हैं।

आखिर चोरी कम हुई या पकड़ने की इच्छा? यही वह सवाल है जो विभाग के अंदर भी चर्चा का विषय बना हुआ है। यदि बिजली चोरी वास्तव में कम हो गई है तो फिर लाइन लॉस में अपेक्षित कमी क्यों नहीं दिखाई दे रही? और यदि चोरी अभी भी जारी है तो कार्रवाई के आंकड़े इतने कम क्यों हैं?

सूत्र बताते हैं कि पुराने लखनऊ के कुछ इलाकों में दिन और रात के लोड में चौंकाने वाला अंतर देखने को मिलता है। दिन के समय जहां किसी क्षेत्र का लोड 60 से 70 एंपियर दर्ज होता है, वहीं रात होते-होते वही लोड बढ़कर 200 से 250 एंपियर तक पहुंच जाता है। सवाल उठता है कि यह अतिरिक्त बिजली आखिर कहां खप रही है?

तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि सामान्य परिस्थितियों में इतनी बड़ी वृद्धि केवल घरेलू खपत से संभव नहीं मानी जाती। ऐसे में संदेह स्वाभाविक है कि कहीं न कहीं बड़े पैमाने पर अनधिकृत खपत या बिजली चोरी का खेल चल रहा है।

पिछले दो वर्षों में आरडीएसएस और बिजनेस प्लान के नाम पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए। दावा किया गया कि उपकेंद्र मजबूत होंगे, लाइन लॉस घटेगा और उपभोक्ताओं को बेहतर आपूर्ति मिलेगी। लेकिन कई इलाकों में आज भी ओवरलोडिंग, ट्रिपिंग और तकनीकी खामियों की शिकायतें बनी हुई हैं।

विभागीय कर्मचारियों का कहना है कि वर्टिकल व्यवस्था के बाद फील्ड स्टाफ पर काम का दबाव कई गुना बढ़ गया है। एक-एक जेई और एसडीओ को कई-कई उपकेंद्रों की जिम्मेदारी संभालनी पड़ रही है। ऐसे में निगरानी और नियंत्रण प्रभावित होना स्वाभाविक है।

बिजली विभाग के गलियारों में यह चर्चा भी आम है कि कुछ स्थानों पर चोरी को संरक्षण मिलने की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जिस प्रकार कार्रवाई के आंकड़े घटे हैं और लाइन लॉस की समस्या बरकरार है, उसने कई सवालों को जन्म दे दिया है।

यदि उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में बिजली चोरी, लाइन लॉस और संसाधनों के उपयोग को लेकर इतने सवाल उठ रहे हैं तो प्रदेश के अन्य जिलों की स्थिति क्या होगी, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है।

अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि आखिर वर्टिकल व्यवस्था से बिजली चोरी कम हुई है या चोरी पकड़ने के आंकड़े? यदि व्यवस्था सफल है तो लाइन लॉस के आंकड़े सार्वजनिक किए जाने चाहिए। और यदि व्यवस्था असफल साबित हो रही है तो इसकी जवाबदेही तय होना भी उतना ही जरूरी है।

फिलहाल मध्य क्षेत्र की विद्युत व्यवस्था में बहुत कुछ ऐसा दिखाई दे रहा है, जो कागजों में नहीं दिखता और जो दिख रहा है, वह कई गंभीर सवाल छोड़ रहा है।

Share

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll Up