Exclusive interview

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देश में जहां इन दिनों एक राष्ट्र एक-चुनाव की चर्चा है, वहीं  इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के खिलाफ राजनीतिक दल लामबंद हो रहे हैं, लेकिन इन सबसे अलग निर्वाचन आयोग चार राज्यों के विधानसभा चुनाव की तैयारियों में व्यस्त है। देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ओपी रावत से चुनाव से जुड़े तमाम मुद्दों पर हिंदुस्तान के ब्यूरो चीफ मदन जैड़ा और विशेष संवादाता श्याम सुमन ने विस्तृत बातचीत की।  प्रस्तुत है मुख्य अंश..
आजकल सबसे ज्यादा चर्चा ‘वन नेशन वन इलेक्शन’ की है। चुनाव आयोग में इस पर क्या हो रहा है?

चुनाव आयोग में अभी कुछ नहीं हो रहा है। हम अपनी राय 2015 में ही इस मुद्दे पर दे चुके हैं। संसदीय समिति ने हमसे पूछा था कि यदि ऐसा करें, तो क्या जरूरत होगी? हमने तभी बता दिया था कि पहले संविधान में संशोधन करना होगा, फिर जन-प्रतिनिधित्व कानून बदलना होगा। इसके बाद फिर हमारी भूमिका आती है। हम सरकार को बताएंगे कि हमें कितनी ईवीएम मशीनें चाहिए, कितने सुरक्षाकर्मी, कितने कार्मिक चाहिए? इसलिए निर्णय सरकार को लेना है।

लेकिन पहले तो एक साथ चुनाव होते थे, तब इसके लिए कोई कानून नहीं था?
होते थे। लेकिन एक बार इनका समय बदल गया, तो फिर उन्हें एक साथ करने के लिए ये बदलाव करने पडें़गे, क्योंकि किसी विधानसभा का समय बढ़ाना पडे़गा, तो किसी का घटाना पडे़गा। फिर अविश्वास प्रस्ताव या चुनावी गठबंधन के कारण यदि कोई सरकार बीच में गिर जाती है, तो उसके लिए भी प्रावधान करने होंगे। यह संविधान में संशोधन के जरिये ही संभव है।

पर आपके पूर्ववर्ती वाई एस कुरैशी इससे सहमत नहीं हैं। तर्क है कि जनाकांक्षाओं पर खरा न उतरने वाले दल को सबक सिखाने के लिए पांच साल इंतजार करना होगा?
सब तर्क अपनी-अपनी जगह सही हैं। पर यह सोचना कि मतदाता रास्ता नहीं तलाश पाएगा, कहना गलत है। मिस्र में सोशल मीडिया के जरिये लोग आज राष्ट्रपति का इस्तीफा करवा देते हैं। मतदाता होशियार है और विकल्प बहुत हैं। मैं एक घटना बताता हूं। एक चुनाव में हमारी टीम ने मतदाताओं को रुपये बांटने पर छापेमारी की। एक मतदाता ने कहा कि हम गरीब हैं, हमें पैसे मिल रहे हैं, तो आप क्यों रोक रहे हैं? यह मत सोचिए कि हम इन्हीं को वोट देंगे। वोट हम अच्छे उम्मीदवार को ही देंगे।

क्या आयोग कॉमन मतदाता सूची पर कार्य कर रहा है, क्योंकि विधानसभा चुनाव में वोट डालने वाले का नाम कई बार लोकसभा चुनाव में सूची में नहीं होता?.

पहले से ही है। लेकिन हर चुनाव के बाद सूची को अपडेट किया जाता है। जैसे दिसंबर में राजस्थान के चुनाव के बाद लोकसभा चुनाव के लिए सूची संशोधित होगी। इस दौरान होने वाले बदलावों की वजह से यह दिक्कत आती है। ऐसी गलतियां निचले स्तर पर कार्यरत कार्मिकों की वजह से होती हैं। शिकायतों की जांच की जाती है। पर असल में जिम्मेदारी तय कर पाना मुश्किल होता है।

निकाय चुनावों के लिए भी ऐसी सूची संभव है?
नहीं। वजह यह है कि लोकसभा और विधानसभा के क्षेत्रों में बदलाव नहीं हो सकता। केंद्र सरकार के फैसले के अनुसार, 2031 की जनगणना के बाद ही परिसीमन हो सकता है, जबकि यह नियम निकायों पर लागू नहीं होता। राज्य सरकारें विभिन्न कारणों से उनमें बदलाव करती रहती हैं। इसलिए लोकसभा और विधानसभा की सूची वहां लागू नहीं हो सकती, क्योंकि उनके मतदान केंद्र भी अलग-अलग होते हैं। स्थानीय निकायों के परिसीमन पर भी रोक लग जाए, तो फिर कॉमन सूची संभव है।

आजकल निकायों के चुनाव भी राजनीतिक दलों के टिकट पर लड़े जा रहे हैं, इसको लेकर क्या नियम हैं?

यह विषय राज्य चुनाव आयोग के दायरे में आता है। वह भी एक सांविधानिक संस्था है। इनको विनियमित करने की जिम्मेदारी उन्हीं की है।

आजकल हर सेवा को आधार से जोड़ा जा रहा है, क्या मतदाता सूची को भी आधार से जोड़ा जाएगा?

हमने 2015 में यह कार्य शुरू कर दिया था। करीब 30 करोड़ मतदाताओं के आधार नंबर लिंक किए जा चुके थे। पर सुप्रीम कोर्ट ने बाद में इस पर रोक लगा दी। हम आधार पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहे हैं।

क्या इससे फायदा होगा?
निश्चित रूप से। इसीलिए हमने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगा रखी है कि हमें अनुमति दी जाए। टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके हम ईवीएम में आधार सत्यापन सुविधा जोड़ सकते हैं। यानी जब सही व्यक्ति वोट देने जाएगा, तभी वोट पड़ेगा। हमें पहचान करने की जरूरत ही नहीं पडे़गी। जैसे ही अनुमति मिलेगी, हम प्रक्रिया चालू कर देंगे और 87 करोड़ मतदाताओं को आधार से जोडे़ंगे।

कहा जा रहा है कि वीवीपैट की आपूर्ति में देरी के चलते जल्दी आम चुनाव होने मुश्किल हैैं?

जल्दी चुनाव होंगे या नहीं, इस पर हम कुछ नहीं बोल सकते हैं। हम अभी चार राज्यों के चुनावों की तैयारी कर रहे हैं, जो 15 दिसंबर से पहले होने हैं। इसी प्रकार, तीन जून से पहले लोकसभा चुनाव संपन्न कराए जाने हैं। इसके हिसाब से हमारी पूरी तैयारियां हैं। चुनाव में सौ फीसदी वीवीपैट इस्तेमाल होंगे। वीवीपैट में कुछ बदलाव किए गए थे, जिसके चलते कुछ देरी हुई। लेकिन 30 सितंबर तक जरूरी वीवीपैट और ईवीएम आ जाएंगी।

लेकिन वीवीपैट और ईवीएम में सामंजस्य नहीं बैठ पा *रहा था, इसे दूर करने के लिए क्या कुछ हुआ?
पिछले चुनावों में गड़बड़ी हुई थी। मैं स्पष्ट करना चाहंूगा कि दिक्कत सिर्फ वीवीपैट में थी, ईवीएम में नहीं। ईवीएम 20 सालों से चल रही है, इसलिए उसके संचालन व रख-रखाव को लेकर हमारे कार्मिक अच्छी तरह से प्रशिक्षित हैं और ईवीएम के फेल होने का प्रतिशत महज .6 फीसदी है। वीवीपैट नई चीज है। फिर यह इलेक्ट्रो मैकेनिकल डिवाइस है। इसमें सेंटर भी हैं। कागज भी लगा है। इसलिए नमी, ज्यादा गरमी व रोशनी का इस पर असर पड़ता है। हमारे विशेषज्ञों ने जांच के बाद इसमें एक हुड लगाया है।

आपको उम्मीद है कि अब कोई दिक्कत नहीं आएगी?.

जो दिक्कतें पहले आई थीं, वे ठीक की गई हैं। देश में 1.10 करोड़ मतदान केंद्र हैं। इसलिए छोटी-मोटी दिक्कतें हो सकती हैं, लेकिन हमारी तैयारियां पूरी हैं।

मतदान केंद्रों पर बैकअप के तौर पर मशीनों का क्या इंतजाम रहता है?

जो मतदान केंद्र सड़क से पांच किलोमीटर दूर होता है, वहां सौ फीसदी बैकअप रहता है। बाकी मामलों में दस बूथों पर एक केंद्र होता है, जहां चार-पांच अतिरिक्त मशीनें रखी जाती हैं, ताकि जरूरत पड़ने पर भेजी जा सकें।

वीवीपैट देश में बन रही हैं या आयात होती हैं?

पूरी तरह से भारत में बन रही हैं। बीईएल और ईसीआईएल इनका निर्माण कर रही हैं।

राजनीतिक दल ईवीएम का विरोध कर रहे हैं। 17 दलों के प्रतिनिधि इस मामले में जल्द चुनाव आयोग को ज्ञापन देने वाले हैं, आप क्या कहेंगे?

इसे इस तरह से सोचें। अरबों रुपयों का ट्रांजेक्शन मशीनों से हो रहा है। उनमें फ्रॉड हो रहे हैं? रेलवे की बुकिंग आज पूरी ऑनलाइन हो रही है। सवाल यह है कि क्या हम पीछे हटकर पुराने सिस्टम पर जाएंगे? तो फिर ईवीएम के पीछे क्यों पडे़ हैं? जो हारता है, वह किसी को जिम्मेदार ठहराता है। खेल में हारे, तो रेफरी और चुनाव में हारे, तो ईवीएम जिम्मेदार। ईवीएम से निरस्त होने वाले मतों की संख्या में भारी कमी आई है। जब मतपत्रों से वोट पड़ते थे। तब रद्द होने वाले वोट हार के अंतर से भी ज्यादा होते थे। .

यानी ईवीएम फुलप्रूफ है, इसे हैक नहीं किया जा सकता?

जब भी ईवीएम पर सवाल उठाए गए हैं। हमने तमाम राजनीतिक दलों और लोगों को खुला चैलेंज दिया कि हैक करके दिखाएं। पर कोई नहीं आया। हाल में कर्नाटक चुनाव में हमने बेंगलुरु में कई स्थानों पर ईवीएम रखी और हैक करने का चैलेंज दिया। वहां एक से एक आईटी विशेषज्ञ हैं। कई देश आज हमारी बनाई ईवीएम का इस्तेमाल कर रहे हैं।

आप ईवीएम की आलोचना करने वालों को रोकने के लिए कुछ कर रहे हैं?

हमने इस पर विचार-विमर्श किया था और विधि आयोग से चर्चा की थी। लेकिन उसने कहा कि ऐसा करना उचित नहीं होगा। बाद में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक आदेश पारित किया कि यदि कोई ईवीएम और चुनाव आयोग की आलोचना करेगा, तो यह कोर्ट की अवमानना मानी जाएगी। छह-सात महीने तक यह आदेश लागू रहा। लेकिन बाद में कोई सुप्रीम कोर्ट चला गया और कोर्ट ने गैग ऑर्डर मानकर इस पर रोक लगा दी।

तो आपको लगता है कि ईवीएम पर सवाल उठाने के पीछे राजनीतिक वजहें हैं?

बिल्कुल। राजनीतिकों को अपनी हार-जीत का एहसास पहले ही हो जाता है। इसके बाद भी वे ईवीएम पर सवाल उठाते हैं, तो यह सिर्फ अपने हाईकमान को संतुष्ट करने के लिए होता है। मैं एक घटना बताता हूं। उत्तर प्रदेश के एक बड़े नेता को चुनाव हारने का एहसास हो गया था। उन्होंने चुनाव के दिन अपने फोन की आईडी की जगह ईसीआई-ईवीएम व पोलिंग स्टेशन का नंबर डाल दिया। फिर ब्ल्यूटुथ ऑन कर दिया। चुनाव के दिन मतदान केंद्र के बाहर गए, तो आस-पास खडे़ लोगों के मोबाइल में ईसीआई-ईवीएम और मतदान केंद्र का नंबर आने लगा। उन्होंने इस पर बवाल खड़ा कर दिया। हमारे विशेषज्ञों ने जांच की, तो मामला पकड़ में आ गया। बाद में जब उन नेताजी की तलाश हुई, तो वह भूमिगत हो गए।

राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए चुनाव आयोग क्या कर रहा है?

चुनाव सुधारों पर सुप्रीम कोर्ट में मामला है। हमने कहा है कि यदि किसी पर आपराधिक दोष साबित हो जाता है, तो उसके आजीवन चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी जाए। ऐसे व्यक्ति को कानून निर्माता नहीं बनाया जा सकता।

क्या पेड न्यूज पर आयोग कड़ा रुख अपना रहा है?

हम रोकथाम के उपाय कर रहे हैं। लेकिन हाईकोर्ट के एक फैसले से मुश्किल हो गई है। एक मामले में कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि चुनाव आयोग खबर को नहीं पढ़ेगा। वह कंटेंट पर फैसला नहीं करेगा। सिर्फ यह देखेगा कि क्या पैसे का लेन-देन हुआ है या नहीं? यदि लेन-देन हुआ है, तभी पेड न्यूज का मामला बनेगा। चुनाव आयोग इस फैसले को चुनौती देने की तैयारी कर रहा है।

देश में राइट टु रिकॉल नहीं है, तो नोटा का क्या फायदा?

यह सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के तहत लिया गया फैसला है। इससे यही फायदा है कि वोट नहीं देने वाले आदमी की पहचान छिपी रहती है।

चुनाव प्रक्रिया में सूचना प्रौद्योगिकी का और क्या इस्तेमाल होने जा रहा है?

जल्दी ही मतदाता अपने क्षेत्र को ऑनलाइन बदल सकेंगे। योजना तैयार है। कर्नाटक और पश्चिम बंगाल में अभी काम बचा है, उसके बाद आप देश में कहीं भी जाएं, खुद ही मतदाता सूची में अपना नाम डाल सकेंगे। .

ये भी कहा 

वोटिंग की आदर्श स्थिति पर

वोटिंग सौ फीसदी होनी चाहिए। लेकिन मतदान का प्रतिशत कई कारणों पर निर्भर करता है। सबसे बड़ी बात है कि सूची में शामिल कितने लोग मतदान के लिए उपलब्ध हैं। मान लीजिए, 100 में से 70 लोग उपलब्ध हैं और 60 वोट देने जाते हैं, तो मतदान प्रतिशत 60 ही रहेगा। अब बेंगलुरु में सबसे ज्यादा जागरूकता है, लेकिन वोटिंग प्रतिशत 56 ही रहा। कारण 15-20 फीसदी ऐसे वोटर हैं, जिनके नाम तो हैं, पर वे वहां रहते नहीं। वैसे, पिछले लोकसभा चुनाव में 64 फीसदी औसत वोटिंग हुई है। अच्छा प्रतिशत है। नॉर्थ ईस्ट, पश्चिम बंगाल, केरल में 80 फीसदी वोटिंग होती है। जिन देशों में अनिवार्य वोटिंग है, वहां भी 82 फीसदी से ज्यादा नहीं होती।

जल्दी ही मतदाता अपने क्षेत्र को ऑनलाइन बदल सकेंगे। योजना तैयार है। कर्नाटक और पश्चिम बंगाल में अभी काम बचा है, उसके बाद आप देश में कहीं भी जाएं, खुद ही मतदाता सूची में अपना नाम डाल सकेंगे।

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