शाही खैरात खाना आज खुद मदद का मोहताज


लखनऊ।( शेख साजिद हुसैन)नवाबों का शहर लखनऊ हमेशा से अपनी तहज़ीब, इंसानियत और दरियादिली के लिए जाना जाता रहा है। यही वह शहर है जहाँ कभी भूखे को खाना, बेसहारा को आसरा और बीमार को इलाज देना इबादत समझा जाता था। इसी इंसानी सोच और रियाया से मोहब्बत की सबसे बड़ी मिसाल था शाही खैरात खाना।
अवध के दूसरे बादशाह नसीर उद्दीन हैदर ने अपने शासनकाल (1827-1837) में इस ऐतिहासिक इमारत को बनवाया था। मकसद सिर्फ एक था समाज के सबसे कमज़ोर और बेसहारा तबकों को सहारा देना। उस दौर में जब दुनिया के कई हिस्सों में गरीबों और बेवाओं को समाज पर बोझ समझा जाता था, तब लखनऊ में उनके लिए शाही खजाने से एक पूरा केंद्र चलाया जाता था।
इंसानियत का वह दरबार जहाँ कोई खाली हाथ नहीं लौटता था
तुड़ियागंज इलाके में बनी इस इमारत में बेवाओं, अनाथ बच्चों, विकलांगों और बेसहारा बुज़ुर्गों के रहने की व्यवस्था थी। यहाँ रहने वालों के लिए सुरक्षित कमरे बनाए गए थे ताकि उन्हें सम्मान और सुकून के साथ जिंदगी जीने का मौका मिल सके।
शाही खैरात खाना सिर्फ रहने की जगह नहीं था, बल्कि यह गरीबों की उम्मीदों का घर था। यहाँ एक विशाल लंगर चलता था जहाँ रोज़ाना दो वक्त का मुफ्त भोजन जरूरतमंदों में बांटा जाता था। इतना ही नहीं, असहाय बुजुर्गों और बेवाओं को मासिक वज़ीफ़ा भी दिया जाता था ताकि वे अपनी छोटी-बड़ी जरूरतें पूरी कर सकें।
आज के दौर में जब सरकारी योजनाओं और राहत शिविरों की चर्चा होती है, तब यह जानना हैरान करता है कि करीब दो सौ साल पहले लखनऊ में ऐसी मानवीय व्यवस्था मौजूद थी, जहाँ इंसान की इज्जत और जरूरत दोनों का ख्याल रखा जाता था।
वास्तुकला में भी झलकती थी रहमत और रियाया से मोहब्बत
शाही खैरात खाना की इमारत पारंपरिक अवधी और मुगल वास्तुकला का खूबसूरत नमूना थी। बड़े फाटक, हवादार दालान, विशाल आंगन और छोटे-छोटे कमरे इस तरह बनाए गए थे कि यहाँ रहने वालों को रोशनी, हवा और सुकून मिल सके।
यह सिर्फ ईंट और पत्थरों की इमारत नहीं थी, बल्कि उस दौर की सामाजिक संवेदनशीलता और इंसानियत की जीवित तस्वीर थी।
शाही शिफाखाना जहाँ मुफ्त होता था इलाज
बादशाह नसीरुद्दीन हैदर ने गरीबों के इलाज का भी खास इंतजाम किया था। शाही खैरात खाना के पास ही ‘शाही शिफाखाना’ या दार-उश-शिफा बनाया गया, जहाँ यूनानी चिकित्सा पद्धति से मुफ्त इलाज किया जाता था। मशहूर हकीम मरीजों का इलाज करते थे और दवाएं भी मुफ्त दी जाती थीं।
चौक इलाके में स्थित यह शाही शिफाखाना कभी गरीबों के लिए राहत का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता था।
आज की हकीकत विरासत पर कब्ज़ा, इंसानियत गुम
जिस शाही खैरात खाना को बेसहारों की मदद के लिए बनाया गया था, आज वही इमारत खुद बदहाली का शिकार है। कभी गरीबों की पनाहगाह रही यह ऐतिहासिक धरोहर अब जर्जर अवस्था में खड़ी अपनी बर्बादी की कहानी बयान कर रही है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, परिसर और बाहरी हिस्सों पर अवैध कब्जे हो चुके हैं। जिन जरूरतमंदों के लिए यह जगह बनाई गई थी, अब वहाँ उनका कोई निशान तक नहीं बचा।
उधर शाही शिफाखाना की हालत भी चिंताजनक है। कभी जहाँ बड़े पैमाने पर मुफ्त इलाज होता था, आज वह एक छोटे से कमरे तक सिमट गया है। बाकी हिस्सों में व्यावसायिक गतिविधियां और दुकानें दिखाई देने लगी हैं।
देखरेख करने वालों पर भी उठ रहे सवाल
स्थानीय लोगों का आरोप है कि जिन लोगों को इन ऐतिहासिक इमारतों की देखरेख और संरक्षण की जिम्मेदारी सौंपी गई है, उनकी लापरवाही के चलते ही आज यह धरोहर बदहाल होती जा रही है। लोगों का कहना है कि समय रहते न तो उचित मरम्मत कराई गई और न ही अवैध कब्जों को रोकने के लिए गंभीर प्रयास किए गए।
क्षेत्र के कई लोगों का मानना है कि अगर जिम्मेदार अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाते तो शायद आज शाही खैरात खाना और शाही शिफाखाना अपनी पुरानी पहचान और शान को बचाए रख पाते।
लोगों में इस बात को लेकर भी नाराज़गी है कि इंसानियत और समाज सेवा की इतनी बड़ी निशानी को धीरे-धीरे व्यावसायिक गतिविधियों और उपेक्षा के हवाले छोड़ दिया गया।
सवाल सिर्फ इमारत का नहीं, विरासत और सोच का है
शाही खैरात खाना की बदहाली सिर्फ एक पुरानी इमारत के टूटने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस सोच के खत्म होने की तस्वीर है जिसमें इंसानियत सबसे ऊपर थी।
आज जरूरत इस बात की है कि प्रशासन, पुरातत्व विभाग और समाज के जिम्मेदार लोग इस ऐतिहासिक धरोहर को बचाने के लिए आगे आएं। अगर समय रहते इस विरासत को नहीं संभाला गया, तो आने वाली पीढ़ियां सिर्फ किताबों में पढ़ेंगी कि लखनऊ में कभी ऐसा भी दौर था जब गरीबों की मदद के लिए शाही खजाने खुल जाया करते थे।
नवाबों के शहर की यह विरासत आज भी जैसे पुकार रही है
“मुझे बचा लो, क्योंकि मेरी दीवारों में इंसानियत की सांसें अब भी बाकी हैं।”
