व्यवस्थाओं पर सवाल और पारदर्शिता की मांग*
“झुकते हैं जहां शाह भी तेरा वोह आस्ताँ
अब्बास तेरे दर सा दुनिया में दर कहां”

*लखनऊ*।(*शेख साजिद हुसैन*) पुराने लखनऊ स्थित दरगाह हज़रत अब्बास सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि अकीदत और भरोसे का वह मुकाम है जहां दूर-दराज़ से आने वाले ज़ायरीन अपनी मुरादों की झोली भरकर लौटने की उम्मीद लेकर आते हैं। यहां लोग अपनी हाजात लेकर आते हैं और पूरी होने पर अकीदत के साथ नज़राना पेश करते हैं।
स्थानीय जानकारों के अनुसार, उत्तर प्रदेश की शिया वक्फ संपत्तियों में कुछ औकाफ ऐसे हैं जो आमदनी के लिहाज़ से बेहद अहम माने जाते हैं। इनमें लखनऊ की दरगाह हजरत अब्बास, जोगी रामपुरा की दरगाह आलिया नजफ हिंद और आगरा स्थित मजार शहीद-ए-सालिस का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है। लोगों का कहना है कि इन औकाफ का मुतवल्ली बनने को लेकर हमेशा दिलचस्पी बनी रहती है, क्योंकि इससे जुड़ी जिम्मेदारियां और संसाधन दोनों महत्वपूर्ण होते हैं।
दरगाह हज़रत अब्बास के मुतवल्ली को लेकर हाल के दिनों में कुछ ऐसी खबरें और वीडियो सामने आए हैं, जिनमें व्यवस्थाओं की खामियां और मुतवल्ली की कार्यशैली पर सवाल उठाए जा रहे हैं। खासतौर पर फिसलन भरे फर्श के कारण हो रहे हादसों और पत्रकारों के साथ हुए विवाद ने मामले को और संवेदनशील बना दिया है।
हालांकि, यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है, लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल हो रही सामग्री ने अकीदतमंदों के बीच चिंता जरूर बढ़ा दी है।
धार्मिक स्थलों की गरिमा बनाए रखना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है वहां की व्यवस्थाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही। स्थानीय लोगों और समाज के कुछ वर्गों का मानना है कि
मुतवल्ली और प्रशासन को चाहिए कि वे व्यवस्थाओं को लेकर स्पष्ट जानकारी दें
यदि कोई खामी है तो उसे स्वीकार कर सुधार के कदम उठाए जाएं
अकीदतमंदों के भरोसे को कायम रखने के लिए सही तस्वीर सामने लाई जाए
अहलेबैत से मोहब्बत रखने वाली कौम अपनी अकीदत में कोई कमी नहीं छोड़ती। ऐसे में यह अपेक्षा भी स्वाभाविक है कि जिन स्थलों से उनकी भावनाएं जुड़ी हैं, वहां प्रबंधन भी पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ कार्य करे, ताकि किसी तरह की शंका या असंतोष की स्थिति न बने।
जहां एक ओर दरगाह की अहमियत और अकीदत का पहलू है, वहीं दूसरी ओर व्यवस्थाओं और जवाबदेही को लेकर उठते सवाल भी नजरअंदाज नहीं किए जा सकते। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि बिना किसी पूर्वाग्रह के तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट की जाए और अगर कहीं कमी है तो उसे दूर कर विश्वास बहाल किया जाए।
दरगाह हज़रत अब्बास आस्था का बड़ा केंद्र है। इसे लेकर उठ रहे सवालों का हल टकराव में नहीं, बल्कि पारदर्शिता, सुधार और संवाद में ही संभव है ताकि अकीदत भी बनी रहे और भरोसा भी।
